Gas Crisis पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर सूरज तेज़ी से चमक रहा था, तभी दोपहर 12.30 बजे के कुछ ही देर बाद नई दिल्ली से आई मगध एक्सप्रेस धीरे-धीरे स्टेशन में दाखिल हुई। पसीने से लथपथ यात्री अपने बैग और सामान थामे डिब्बों से बाहर निकले; उनके चेहरों पर उस सफ़र की थकान साफ़ झलक रही थी, जो पिछली शाम को देश की राजधानी में शुरू हुआ था। इन यात्रियों में से एक मसौढ़ी के रहने वाले 32 साल के राजेश मांझी, जो पिछले आठ सालों से दिल्ली में दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर कंस्ट्रक्शन का काम कर रहे थे। एक डिब्बे के दरवाज़े पर खड़े मांझी अपने तीन साल के बेटे को एक हाथ से थाम रखा था; बेटा उनके कंधे से टिककर सो गया था। उनके दूसरे हाथ में कपड़ों और बर्तनों से भरा एक पुराना सा कपड़े का थैला था। उनकी पीठ पर एक छोटा सा बैकपैक टंगा हुआ था। उनकी पत्नी, जो उनसे कुछ ही कदम आगे उतरी थीं, बच्चे को लेने के लिए पीछे मुड़ीं; पासवान ने अपने कंधे पर टंगे थैले को ठीक किया और फिर प्लेटफॉर्म पर कूदकर उतर गए।
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