जब विक्रम रेड्डी सुदिनी 1999 में हैदराबाद छोड़कर अमेरिका रवाना हुए थे, तो उनके साथ सिर्फ़ सूटकेस नहीं था, बल्कि क्रिकेटर बनने का एक अधूरा सपना भी था। स्थानीय टूर्नामेंट, जूनियर क्रिकेट और लीग मैच खेलने के बावजूद उनका सफर एक मुकाम पर थम गया। लेकिन किस्मत ने उस सपने को कभी खत्म नहीं होने दिया; बल्कि उसे अगली पीढ़ी के लिए संजोकर रख लिया।जब विक्रम रेड्डी सुदिनी 1999 में हैदराबाद छोड़कर अमेरिका रवाना हुए थे, तो उनके साथ सिर्फ़ सूटकेस नहीं था, बल्कि क्रिकेटर बनने का एक अधूरा सपना भी था। स्थानीय टूर्नामेंट, जूनियर क्रिकेट और लीग मैच खेलने के बावजूद उनका सफर एक मुकाम पर थम गया। लेकिन किस्मत ने उस सपने को कभी खत्म नहीं होने दिया; बल्कि उसे अगली पीढ़ी के लिए संजोकर रख लिया।
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