कालीदास रंगालय में सादत हुसैन उर्फ मंटू के लिखित नाटक का मंचन किया गया !

    ” अकेली ” नामक इस नाटक का केंद्र सुशीला थी जो पैरों में घुंघरू बाँध कर सच्चे प्यार को पाने की आशा रखती है !एक नाचने वाली को सच्चे प्यार की कामना नहीं करनी चाहिए ये उससे काम लेने वाले साथी किशोर का मानना है, जो कहता है कि ” प्यार आख़िर होता क्या है , मैं नहीं जानता ” !
    सुशीला की मुलाकात मोती लाल से होती है ! दोनों को एक दूसरे से मोहब्बत हो जाती है ! साथ जीवन बिताने के उद्देश्य से सुशीला मोती के साथ भाग जाती है !

    मोती को तार भेज कर घर बुलाया जाता है !
    मोती के जाने के बाद उसकी मंगेतर सुशीला से मोती के सुखी भविष्य के लिए उसे छोड़ने को कहती है ! सुशीला किशोर के पास वापस चली जाती है और नाचने गाने लगती है !

    मोती उसे वापस पाना चाहता है पर सुशीला उसे ग़रीबी का ताना देकर दूर जाने को कहती है !
    इस बात से आहत मोती शेयर बाज़ार में उतार चढ़ाव कर किशोर को बरबाद कर देता है और ये बात सुशीला को बताता है !

    सुशीला बरबाद हो चुके किशोर को बताती है कि मोती उसकी बरबादी का कारण है !
    अब वह ख़ुद नए सीरे से ज़िंदगी शुरू करना चाहती है ! किशोर कहता है मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है ” पर अब काफ़ी देर हो चुकी है ” कहकर सुशीला नई मंज़िल की तलाश में रेलवे स्टेशन पहुँचती है , जहाँ उससे एक मुसाफ़िर पूछता है ” क्या आपके साथ कोई है ” सुशीला कहती है ” मैं अकेली हुं “!
    सभी कलाकारों ने अपने किरदार के साथ पूरा-पूरा इंसाफ़ किया है और ” मंटू ” की कहानी में जान फूंक दी है !

    रेशमा ख़ातून
    की
    रिपोर्ट.

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