भोजपुर एक ऐसा स्थान है ,जो बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर सोन और गंगा की दोआब में स्थिति है दक्षिण और पश्चिम में कैमूर की पहाडियों से घिरा हुआ है ये भू- भाग अपनी भाषा और संस्कृति और विशेष खान-पान के लिए जानी जाती है .सबसे पहले शाहाबाद जिले की स्थापना संन 1785 में हुई थी पहली बार शाहाबाद और रोहतास 10 नवम्बर 1972 को दो जिलो में बटा था .वहीं पुनः 1991 में भोजपुर दो भागो में बटा एक पूर्वी क्षेत्र भोजपुर और दूसरा बक्सर. यह 2474 वर्ग मीटर में फैला है समुद्र ताल से इसकी उचाई 192.989 है
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14 प्रखंडो में बटे इस जिले के कोने – कोने में इतिहास छिपा है दोस्तों इसके गौरवशाली इतिहास को समझाने के लिए एक बड़ा कैनवास कम पड जाएगा …………………………………….
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धार्मिक नजरिये से देखे तो प्राचीन समय से ही भोजपुर जैन धर्म का महतवपूर्ण केंद्र है .यहाँ 25 शिखर बंद और 20 चैतालय है यहाँ पर भगवान महावीर भी पधार चुके है सम्राट अशोक और शेर शाह सूरी , गुरु गोविन्द सिंह जैसे महान नायक भी पधार चुके है
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देश को आजादी दिलाने की लड़ाई में इस जिले का काफी नाम है 80 साल के उम्र में बाबु वीर कुवर सिंह ने इसी धरती से अग्रेजो के छक्के छुड़ाए थे यहाँ पर राम नरेश त्रिपाठी , कवि कैलाश जैसे महान सेनानी हुए जिन्होंने गाँधी जी के रास्ते पर चलते हुए अहिंसा को हथियार बनाकर देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई . लसाधी , ढकनी , कारीसाथ , चासी . जगदीशपुर , सासाराम , लोदीपुर ,नकनाम टोला आदि दर्जनों गाँव के लोगों ने आजादी दिलानी की लड़ाई में अहम भूमिका अदा की १८५७ के क्रांति का मुख्य गवाह आरा हाउस जो अभी भी है .
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अश्वारोही सैन्य पुलिस का बिहार का मुख्यालय आरा में है . यह स्थानीय कलकट्री तालाब के पास है . बताया जाता है कि इस वाहिनी की स्थापना 19 अक्टूबर 1919 ई. को की गई थी . इस वाहिनी का गौरवमय इतिहास रहा है . इसके कई सवार अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में शामिल होकर जिला व प्रदेश का नाम रोशन किए हैं
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आरा रंगमंच का इतिहास 100 साल से भी अधिक प्राचीन है . यहां के कामायनी, नवोदय संघ, बिरजू महाराज कला आश्रम, युवानीति, यवनिका, मानवीय महिला सेवार्पण केंद्र, नटी ,भूमिका, स्वामी विवेकानंद फांउंडेशन, उर्वशी, अभियान समेत अन्य संस्थाओं ने अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में शामिल होकर जिले का नाम रौशन किया
@ बिकेश्वर त्रिपाठी (MJMC Student)
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