आस्था और छठ दोनों खत्म हो गई

    छठ पूजा समाप्त हो चुकी है घाट खाली हो गई है नहाने हेतु लोगो का सुबह आना कुछ हद तक जारी है कारण अभी कातिक समाप्ति में समय शेष है, प्रधानमंत्री की मन की बात में छठ पूजा के पक्ष में की गई बाते अभी इंटरनेट पर ज्यादा वायरल नही है, क्योंकि लोगो के पास दूसरे अच्छे मुद्दे है, छठ तो बीते दिनों की बात हो गई, लोगो की आस्था एकाएक गंगा के लिए कम हो गई ऐसा लगता है अब अगले साल ही आस्था में डूबे लोगों का जनसमूह देखने को मिलेगा, समाजसेवी संघठन भी अब अपनी सफाई अभियान के लिए उठाए बाहें समेट रही है,घाटों के करीब पुलिस और अपराधियों(जिसमे ज्यादातर गरीब ही शामिल है) की युद्ध चालू है, शराब बेचने वाले और पीने वाले घाटों पर अंधेरे का खूब फ़ायदा उठाते है, उनके लिए तो अंधेरा कायम रहे यही अच्छा, दिक्कत तो उस पार के यात्रियों को होती है जिन्हें अंधेरे में ही नाँव पर उछल कर बैठना होता है। रोज ये दिलेर लोग जान हथेली पर लेकर नाँव से गंगा पार करते है, बोलते है अगर साल भर छठ जैसा चकाचक रहे घाट तो कितना अच्छा हो खैर ये मुमकिन नही पर हर वार्ड पार्षद अपने वार्ड में आने वाले घाटों पर सोलर लाइट तो लगा ही सकते है, इसमे समाज में काम करने वाले गैरसरकारी संस्थान/संघठन भी मदत को आगे आये तो कितना अच्छा हो, अभी एन.आई.टी पटना घाट को ही देखिये मजाल है किसी की वहाँ शराब का धन्धा करने की, प्रशासन भी क्या करें और अधिकारी भी क्या करें जब जनता ही जागरूक नही होना चाहे तो, नाँव डूबने की घटनाओं से भी अगर लोगो की आंख नही खुली तो क्या करें। जहाँ नाँव का परिचालन होता हो हर उस घाट पर आपदा प्रबंधन के जवानों को एक चौकी बनानी चाहिए जिससे किसी भी तरह की घटना होने पर जल्द राहत पहुँच सके, और चिन्हित घाटों पर ही परिचालन हो, मुख्यमंत्री के अनुसार नदियों के किनारों पर जैविक कॉरिडोर से खेती भी होगी पर फ़िलहाल घाटों पर रोशनी हो जाएं वही काफी होगा ।

    पटना से

    उधव कृष्ण

    की एक विशेष

    रिपोर्ट।




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